Sunday, December 25, 2016

देशबंधु

प्रश्न: हिन्दुओं को एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार नहीं है, पर मुसलमान 3-4 पत्नियाँ रख सकता है . ऐसे में एक दिन हिन्दू अल्पसंख्यक नहीं हो जाएँगे?

उत्तर: जो आप कह रहे हैं वह 'विश्व हिन्दू परिषद्' और 'आरएसएस' का प्रचार है . आपको कई भ्रमों में फँसा लिया गया है . इस देश पर सात सौ साल मुसलमानों का शासन रहा है फिर भी हिन्दू कम नहीं हुए. अभी हिन्दू 85 फीसदी हैं . मगर हिन्दू हैं कौन? अछूत तथा नीची जाति के लोग क्या हिन्दू हैं ? ये हिन्दू हैं तो ऊंची जाति के लोग इन्हें छोटे क्यों नहीं? इन्हें सामूहिक रूप से क्यों मारते हैं? इनके झोपड़े क्यों जलाते हैं? हिन्दू कोई नहीं है - ब्राह्मण हैं, कायस्थ हैं, अग्रवाल हैं, बढई हैं, नाई हैं, भंगी हैं, चमार हैं.

एक बात सोचिये, हज़ारों सालों से इस देश में हिन्दू हमेशा करोडो रहे हैं और हमला करने वाले सिर्फ हज़ारों . मगर हारे हिन्दू ही हैं . नादिरशाह के पास सिर्फ एक हज़ार सिपाही थे . अगर हिन्दू पत्थर मारते तो भी वे मर जाते . दस हज़ार अंग्रेज़ तीस करोड़ भारतीयों पर राज करते रहे हैं . संख्या से कुछ नहीं होता .

आप सौ मुसलामानों का यूं ही पता लगाइए . इनमें कितनों की 3-4 बीवियाँ हैं . आपको किसी की नहीं मिलेगी . हज़ारों में कोई एक मुसलमान एक से ज्यादा बीवी रखता है बाकि सब एक बीवी ही रखते हैं . मुसलमान नसबंदी कराते हैं . मुसलमान औरतें भी ऑपरेशन कराती हैं . अभी संख्या ज़रूर कुछ कम है .

अच्छा हिन्दू बढाने के लिए संतति निरोध बंद कर देते हैं और हर हिन्दू को 3-4 पत्नियाँ रखने का अधिकार दे दें तो बेहिसाब हिन्दू पैदा होंगे . पर आम हिन्दू के 15-20 बच्चे होंगे इन्हें वो कैसे पालेगा? क्या खिला सकेगा? कपडे पहना सकेगा? शिक्षा दे सकेगा? ये भुखमरे, मरियल , अशिक्षित करोड़ों हिन्दू होंगे या कीड़ें और केचुएँ? क्या कीड़ें और केचुए से किसी जाति की उन्नति होती है?

आबादी बढ़ती रही तो कितना ही उत्पादन हो, हम भूखे और गरीब रहेंगे, मगर हिन्दू-मुसलमान दोनों के साम्प्रदायिक नेता अपनी जाति बढ़ाने के लिए कहते हैं. जो बात विश्व हिन्दू परिषद् वाले और आरएसएस वाले हिन्दुओं से कहते हैं वैसी ही बात मुल्ला मुसलामानों से कहते हैं - नसबंदी मत कराओ. मुसलमान बढ़ाओ. अब मुसलामानों की गरीबी, अशिक्षा आदि देखो.

शैतान धार्मिक नेताओं और सांप्रदायिक राजनीतिवालों ने यह सिखा दिया है कि हिन्दू और मुसलमान दोनों के जीवन का एकमात्र उद्देश्य और महान राष्ट्रिय कर्म एक दुसरे को दबाना है. यह हद दर्जे की बेवकूफी और बदमाशी है. ऐसा सिखाना देशद्रोह और राष्ट्रद्रोह है. हमें भारतीयता के नज़रिए से सोचना चाहिऐ.

#देशबंधु > पूछो परसाई से (अंक दिनाँक:  5 फरवरी 1984)

Saturday, December 24, 2016

सूअर

चौबे जी को मैं पांडे जी के घर ले गया।
चौबे जी के लड़के की शादी की बात पांडे जी की लड़की से चल रही थी।
हम पांडे जी के घर के बरामदे में बैठे थे। लड़की चाय-नाश्ता दे गई थी। चौबे जी ने उसे देख लिया था। पांडे जी का पैतृक मकान था। वह शहर के पुराने मुहल्ले में था। गंदा मुहल्ला था। बरामदे से कचरे के ढेर दिख रहे थे। आसपास सूअरों की कतारें घूम रही थीं।
चौबे जी यह देख रहे थे और उन्हें मतली-सी आ रही थी। वे बोले- हॉरीबल! इस कदर सूअर घूमते हैं, घर के आसपास!
बाकी बातें मुझे करनी थीं। हम लौटे। चौबे जी से मैं दो-तीन दिन बाद मिला। उन्होंने कहा- भई, लड़की ताे बहुत अच्छी है। मगर पांडे का घर बहुत गंदी जगह पर है। सूअर आसपास घूमते हैं। हॉरीबल!
मैंने कहा- मगर आपको उस घर से क्या करना है? आपको तो लड़की ब्याह कर लानी है।
चौबे जी ने कहा- मगर क्या लड़का ससुराल नहीं जाएगा? या मैं समधी से कोई संबंध नहीं रखूंगा? मैं सबसे ज्यादा इस सूअर से नफरत करता हूं। आई हेट दीज़ पिग्ज़। मुझे अभी भी उस घर की कल्पना से मतली आती है।
मैंने कहा- सोच लीजिए। लड़की बहुत अच्छी है। परिवार अच्छा है।
चौबे जी ने कहा- सो तो मैं मानता हूं। मगर मैं लड़के की बारात लेकर उनके दरवाजे पर पहुंचा और मुझे उलटी हो गई तो? दोज़ पिग्ज़। मैं बरदाश्त नहीं कर सकता।
मैंने कहा- वैसे पांडे काफी देंगे।
चौबे बोले- क्या देंगे? यही दस-पंद्रह हजार।
मैंने कहा- नहीं, पचास हजार देंगे। जेवर अलग। एक ही तो उनकी संतान है।
चौबे जी सोचने लगे। सूअर से लौटकर रुपयों तक आने में उन्हें कुछ वक्त लगा। थोड़ी और बातचीत के बाद उन्होंने कहा- जब तुम्हारा इतना जोर है, तो रिश्ता तय कर दो।
चौबे जी ठाठ से बेटे की बारात लेकर पांडे जी के द्वार पर पहुंचे।
द्वार पर पंद्रह हजार रुपए दिए गए।
शामियाने के नीचे चौबे जी बैठे थे। उनकी नजर वहीं लगी थी, जहां विवाह की रस्में हो रही थीं। वे इंतजार कर रहे थे कि थाली में पैंतीस हजार और आते होंगे।
इसी समय एक सूअर का बच्चा वहां घुस आया। दो-तीन लोग उसे बाहर खदेड़ने लगे। एक-दो ने उसे छड़ी मारी। सूअर का बच्चा घबराकर भटक गया। उसे रास्ता नहीं मिल रहा था। वह चौबे जी की तरफ बड़ा। लोग उसके पीछे पड़े थे। चौबे जी ने कहा- अरे, अरे, उसे तंग मत करो। सूअर का बच्चा बड़ा खूबसूरत होता है। वेरी स्वीट!
और चौबे जी प्यार से सूअर के बच्चे पर हाथ फेरने लगे। इसी समय थाली में पैंतीस हजार रुपए आ गए।
सूअर का बच्चा ऐसे इत्मीनान से खड़ा था जैसे अपने पिता के पास हो।

----- सूअर

आफ्टर आल आदमी

तारीख उन्नीस मार्च को लोकसभा के लिए मतदान होना था। सरकार तब कांग्रेस की थी। अठारह मार्च की शाम को पड़ोस के दो-तीन लाेगों के साथ बैठा मैं चुनाव पर बात कर रहा था। ‘वे’ भी थे।

एक ने कहा- कल मतदान हो जाएगा।

दूसरे ने कहा- इस बार जनता पार्टी का बड़ा जोर है।

वे बोले- हम तो जी, कांग्रेस को ही वोट देंगे। आफ्टर आल हम सरकारी नौकर हैं।

मतदान हो गया। बाईस तारीख को चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद हम लोग फिर बैठे बातें कर रहे थे।

एक ने कहा- अब तो जनता पार्टी की सरकार बन ही गई।

दूसरे ने कहा- किसी को उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस इतनी बुरी तरह हारेगी और जनता पार्टी इस तरह जीतेगी।

वे बोले- ठीक है जी, हमारा वोट जनता पार्टी के काम आया। मुझे याद आया कि ये तो कह रहे थे कि मैं कांग्रेस को वोट दूंगा। मैंने उनसे पूछा- तो क्या आपने जनता पार्टी को वोट दिया था? वे बोले- हां जी, आफ्टर आल हम सरकारी नौकर हैं।

----- आफ्टर आल आदमी

स्नान

गर्मी में नहाना तो फिर भी माफ़ किया जा सकता है ,  पर ठण्ड में  रोज नहाना बिलकुल प्रकृति विरुद्ध है। जिन्हे ईश्वर में विश्वास है , वे यह क्यों नहीं सोचते कि यदि शीत ऋतु भी रोज नहाने की होती , तो वह इतनी ठण्ड क्यों पैदा करता ? शीत ऋतु उसने नहाने के लिए बनाई ही नहीं है, लेकिन आप 'सी सी ' करते जा रहे और रोज नहा  रहे है

#स्नान